गयीगुजरी नहीं है कि उसकी शय्या, जिसके लिए बड़ेबड़े समराट लालायित रहते थे, किसी विदेशी पुरुष का स्वागत करे। मैं किसी की शरणागत नहीं होना चाहती।'
हेक्युबा जो अभी तक भूमि पर अचेतसी पड़ी थी सहसा उठी और अपनी पिरय पुत्री को छाती से लगा लिया। यह उसका अन्तिम नैराश्यपूर्ण आलिंगन था। पतिवंचित मातृहृदय के लिए संसार में कोई अवलम्ब न था। पॉलिक्सेना ने धीरेसे माता के हाथों से अपने को छुड़ा लिया, मानो उससे कह रही थी- 'माता, धैर्य से काम लो ! अपने स्वामी की आत्मा को दुखी मत करो। ऐसा क्यों करती हो कि यह लोग निदर्यता से जमीन पर गिरकर मुझे अलग कर लें ?'
थायस का मुखचन्द्र इस शोकावस्था में और भी मधुर हो गया था, जैसे मेघ के हलके आवरण से चन्द्रमा। दर्शकवृन्द को उसने जीवन के आवेशों और भावों का कितना अपूर्व चित्र दिखाया ! इससे सभी मुग्ध थे ! आत्मसम्मान,
नहीं करता !'
पापनाशी-'पुत्र, जो मैं कहता हूं वह करो, अपने स्वामी से इतना ही कह दो कि मैं उससे मिलना चाहता हूं।'
दरबान ने क्रोध के आवेश में आकर कहा-'चला जा यहां से, भिखमंगा कहीं का !' और अपनी छड़ी उठाकर उसने पापनाशी के मुंह पर जोर से लगाई। लेकिन योगी ने छाती पर हाथ बांधे, बिना जरा भी उत्तेजित हुए, शांत भाव से यह चोट सह ली और तब विनयपूर्वक फिर वही बात कही-'पुत्र, मेरी याचना स्वीकार करो।'
दरबान ने चकित होकर मन में कहा-यह