दिया है। यह निर्विवाद है कि स्त्री पुरुष का शत्रु और मानवजाति का कलंक है।
पापनाशी ने इसका समर्थन किया-'बहुत सत्य कहते हो, स्त्री हमारी पराणघातिका है। उससे हमें कुछ आनन्द पराप्त होता है और इसलिए उससे सदैव डरना चाहिए।'
उसके साथी ने जिसका नाम डोरियन था, कहा-'स्वर्ग के देवताओं की शपथ खाता हूं; स्त्री से पुरुष को आनन्द नहीं पराप्त होता, बल्कि चिन्ता, दुःख और अशान्ति। परेम ही हमारे दारुणतम कष्टों का कारण है। सुनो मित्र, जब मेरी तरुणावस्था थी तो मैं एक द्वीप की सैर करने गया था और वहां मुझे एक बहुत बड़ा मेंहदी का वृक्ष दिखाई दिया जिसके विषय में यह दन्तकथा परचलित है कि फीडरा जिन दिनों हिमोलाइट पर आशिक थी तो वह विरहदशा में इसी वृक्ष के नीचे बैठी रहती थी और दिल बहलाने के लिए अपने बालों की सुइयां निकालकर इन पत्तियों में चुभाया करती थी। सब पत्तियां
साधारण बोलचाल में कितना परतिभाशाली स्थान है, कितना गौरव से भरा हुआ। इस्कन्द्रिया ! मेरी विशाल जन्मभूमि ! तेरे बालक तेरा पुत्रवत सम्मान करते हैं, यह स्वाभाविक है। लेकिन योगी परकृति को अवहेलनीय समझता है, साधु बहिरूप को तुच्छ समझता है, परभु मसीह का दास जन्मभूमि को विदेश समझता है, और तपस्वी इस पृथ्वी का पराणी ही नहीं। मैंने अपने हृदय को तेरी ओर से फेर लिया है। मैं तुमसे घृणा करता हूं। मैं तेरी सम्पत्ति को, तेरी विद्या को, तेरे शास्त्रों को, तेरे सुखविलास को, और