कान में आ रही है, आकाश रक्तवर्ण हो गया है। उसे ज्ञात हुआ कि धमार्धर्म के विचार का दिन आ पहुंचा। वह बड़ी तन्मयता से ईशवन्दना करने लगा। इसी बीच में उसने एक अत्यन्त भयंकर जंतु को अपनी ओर आते देखा, जिसके माथे पर परकाश का एक सलीव लगा हुआ था। पापनाशी ने उसे पहचान लिया-सिलसिली की पिशाचमूर्ति थी। उस जन्तु ने उसे दांतों के नीचे दबा लिया और उसे लेकर चला, जैसे बिल्ली अपने बच्चे को लेकर चलती है। इस भांति वह जन्तु पापनाशी को कितने ही द्वीपों से होता, नदियों को पार करता, पहाड़ों को फांदता अन्त में एक निर्जन स्थान में पहुंचा, जहां दहकते हुए पहाड़ और झुलसते राख के ेरों के सिवाय और कुछ नजर न आता था। भूमि कितने ही स्थलों पर फट गयी थी और उसमें से आग की लपट निकल रही थी। जन्तु ने पापनाशी को धीरे से उतार दिया और कहा-'देखो !'

पापनाशी ने एक


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ने गवैये का वध कर डाला। मेरी भावज शोक से अव्यवस्थितचित्त हो गयी। यह तीनों अभागे पराणी बुद्धि को वासनाओं की बलिदेवी पर च़ाकर शहर की गलियों में फिरने लगे। नंगे, सिर के बाल ब़ाये, मुंह से फिचकुर बहाते, कुत्ते की भांति चिल्लाते रहते थे। लड़के उन पर पत्थर फेंकते और उन पर कुत्ते दौड़ाते। अन्त में तीनों मर गये और मेरे पिता ने अपने ही हाथों से उन तीनों को कबर में सुलाया। पिताजी को भी इतना शोक हुआ कि उनका दानापानी छूट गया और वह अपरिमित धन रहते हुए भी


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