के मनोरंजन के निमित्त कही गयी है। उनको पॄकर हमारा मनोरंजन उसी भांति होता है जैसे अन्य कथाओं को पॄकर।'
इसके बाद अपने मेहमान का हाथ पकड़कर वह उसे एक कमरे में ले गया जहां हजारों लपेटे हुए भोजपत्र टोकरों में रखे हुए थे। उन्हें दिखाकर बोला-'यही मेरा पुस्तकालय है। इसमें उन सिद्घान्तों में से कितनों ही का संगरह है जो ज्ञानियों ने सृष्टि के रहस्य की व्याख्या करने के लिए आविष्कृत किये हैं। सेरापियम* में भी अतुल धन के होते हुए; सब सिद्घान्तों का संगरह नहीं है ! लेकिन शोक ! यह सब केवल रोगपीड़ित मनुष्यों के स्वप्न हैं !'
उसने तब अपने मेहमान को एक हाथीदांत की कुरसी पर जबरदस्ती बैठाया और खुद भी बैठ गया। पापनाशी ने इन पुस्तकों को देखकर त्यौरियां च़ायीं और बोला-'इन सबको अग्नि की भेंट कर देना चाहिए।'
निसियास बोला-'नहीं पिरय मित्र, यह घोर अनर्थ होगा;
उस निबुद्धि, कर्महीन सम्परदाय में हो, जो सूर्य के परकाश में और रात्रि के अन्धकार में कोई भेद नहीं कर सकते ?'
'हां मित्र, मैं वास्तव में भरमवादी हूं। मुझे इस सम्परदाय में शान्ति मिलती है, चाहे तुम्हें हास्यास्पद जान पड़ता हो। क्योंकि एक ही वस्तु भिन्नभिन्न अवस्थाओं में भिन्नभिन्न रूप धारण कर लेती है। इस विशाल मीनारों ही को देखो। परभात के पतीपरकाश में यह केशर के कंगूरोंसे देख पड़ते हैं। सन्ध्या समय सूर्य की ज्योति दूसरी ओर पड़ती है और कालेकाले त्रिभुजों के सदृश दिखाई देते