द्वार देख, नहीं तो मैं डंडे से खबर लूंगा।'
पापनाशी ने सरल भाव से कहा-'मैं कुछ भिक्षा मांगने नहीं आया हूं। मेरी केवल यही इच्छा है कि मुझे अपने स्वामी निसियास के पास ले चलो।'
गुलाम ने और भी बिगड़कर जवाब दिया-'मेरा स्वामी तुमजैसे कुत्तों से मुलाकात नहीं करता !'
पापनाशी-'पुत्र, जो मैं कहता हूं वह करो, अपने स्वामी से इतना ही कह दो कि मैं उससे मिलना चाहता हूं।'
दरबान ने क्रोध के आवेश में आकर कहा-'चला जा यहां से, भिखमंगा कहीं का !' और अपनी छड़ी उठाकर उसने पापनाशी के मुंह पर जोर से लगाई। लेकिन योगी ने छाती पर हाथ बांधे, बिना जरा भी उत्तेजित हुए, शांत भाव से यह चोट सह ली और तब विनयपूर्वक फिर वही बात कही-'पुत्र, मेरी याचना स्वीकार करो।'
दरबान ने चकित होकर मन में कहा-यह तो विचित्र आदमी है जो मार से भी नहीं डरता और तुरन्त
नहीं जानते तो तुम्हारा धर्मकर्म सब व्यर्थ है, तुम कभी अनन्तपद नहीं पराप्त कर सकते।'
वुद्ध-'कर्म करना, या कर्म से हटना दोनों ही व्यर्थ हैं। हमारे जीवन और मरण में कोई भेद नहीं।'
पापनाशी-'क्या, क्या? क्या तुम अनन्त जीवन के आकांक्षी नहीं हो ? लेकिन तुम तो तपस्वियों की भांति वन्यकुटी में रहते हो ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या मैं तुम्हें नग्न और विरत नहीं देखता ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या तुम कन्दमूल नहीं खाते और इच्छाओं का दमन नहीं करते