मण्डप था। उसके मेहराब की छांह में कई दरिद्र भिक्षुक बैठै हुए पथिकों के सामने हाथ फैलाफैलाकर खैरात मांग रहे थे।
एक वृद्घा स्त्री ने जो वहां घुटनों के बल बैठी थी, पापनाशी की चादर पकड़ ली और उसे चूमकर बोली-'ईश्वर के पुत्र, मुझे आशीवार्द दो कि परमात्मा मुझसे सन्तुष्ट हो। मैंने परलौकिक सुख के निमित्त इस जीवन में अनेक कष्ट झेले। तुम देव पुरुष हो, ईश्वर ने तुम्हें दुःखी पराणियों के कल्याण के लिए भेजा है, अतएव तुम्हारी चरणरज कंचन से भी बहुमूल्य है।'
पापनाशी ने वृद्ध को हाथों से स्पर्श करके आशीवार्द दिया। लेकिन वह मुश्किल से बीस कदम चला होगा कि लड़कों के एक गोल ने उसको मुंह चिना और उस पर पत्थर फेंकना शुरू किया और तालियां बजाकर कहने लगे-'जरा अपनी विशालमूर्ति देखिए ! आप लंगूर से भी काले हैं, और आपकी दा़ी बकरे की ाढ़ी से लम्बी है। बिल्कुल भुतना मालूम होता
खजूर के पत्तियों की थी और उसका आधा भाग बालू के नीचे दबा हुआ था। उसे आशा हुई कि इनमें अवश्य कोई सन्त रहता होगा। उसने निकट आकर एक बिल के रास्ते अन्दर झांका (उसमें द्वार न थे) तो एक घड़ा, प्याज का एक गट्ठा और सूखी पत्तियों का बिछावन दिखाई दिया। उसने विचार किया, यह अवश्य किसी तपस्वी की कुटिया है, और उनके शीघर ही दर्शन होंगे हम दोनों एकदूसरे के परति शुभकामनासूचक पवित्र शब्दों का उच्चारण करेंगे। कदाचित ईश्वर अपने किसी कौए द्वारा रोटी का एक टुकड़ा