से जो, खजूर, फूल और फल के वृक्षों से के हुए थे; ये बत्तख, लालसर, हारिल आदि ये चिड़ियां कलरव करती हुई निकल रही थी। बाईं ओर मरुस्थल तक हरेभरे खेतों और वृक्षपुंजों की शोभा आंखों को मुग्ध कर देती थी। पके हुए गेहूं के खेतों पर सूर्य की किरणें चमक रही थीं और भूमि से भीनीभीनी सुगन्ध के झोके आते थे। यह परकृतिशोभा देखकर पापनाशी ने घुटनों पर गिरकर ईश्वर की वन्दना की-'भगवान्, मेरी यात्रा समाप्त हुई। तुझे धन्यवाद देता हूं। दयानिधि, जिस परकार तूने इन अंजीर के पौधों पर ओस की बूंदों की वर्षा की है, उसी परकार थायस पर, जिसे तूने अपने परेम से रचा है, अपनी दया की दृष्टि कर। मेरी हार्दिक इच्छा है कि वह तेरी परेममयी रक्षा के अधीन एक नवविकसित पुष्प की भांति स्वर्गतुल्य जेरुशलम में अपने यश और कीर्ति का परसार करे।' और तदुपरान्त उसे जब कोई वृक्ष फूलों से सुशोभित


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भगा दिया जो शताब्दियों से इन परतिमा में अड्डा जमाये हुए था। उसका धमोर्त्साह ब़ा, उसने एक पत्थर उठाकर परतिमा के मुख पर मारा। चोट लगते ही परतिमा का मुख इतना उदास हो गया कि पापनाशी को उस पर दया आ गयी। उसने उसे सम्बोधित करके कहा-हे परेत, तू भी उन परेतों की भांति परभु पर ईमान ला जिन्हें परातःस्मरणीय एण्तोनी ने वन में देखा था, और मैं ईश्वर, उसके पुत्र और अलख ज्योति के नाम पर तेरे उद्घार करुंगा।

यह वाक्य समाप्त होते ही सिंफक्स के नेत्रों में अग्निज्योति


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