होते हैं। या तो वह वस्तु नहीं मिलती जिसकी उन्हें अभिलाषा होती है अथवा उसे पाकर उन्हें उसके हाथ से निकल जाने का भय होता है अथवा जिस चीज को वह बुरा समझते हैं उसका उन्हें सहन करना पड़ता है। इन विचारों को चित्त से निकाल दो और सारे दुःख आपही-आप शांत हो जाएेंगे। संसार के श्रेष्ठ पदार्थों का परित्याग कर दूंगा और उसी भारतीय योगी की भांति मौन और निश्चल रहूंगा।'

पापनाशी ने इस कथन को ध्यान से सुना और तब बोला-'टिमो, मैं स्वीकार करता हूं कि तुम्हारा कथन बिल्कुल अर्थशून्य नहीं है। संसार की धनसम्पत्ति को तुच्छ समझना बुद्धिमानों का काम है। लेकिन अपने अनन्त सुख की उपेक्षा करना परले सिरे की नादानी है। इससे ईश्वर के क्रोध की आशंका है। मुझे तुम्हारे अज्ञान पर बड़ा दुःख है और मैं सत्य का उपदेश करुंगा जिसमें तुमको उसके अस्तित्व का विश्वास हो जाए और तुम आज्ञाकारी बालक के समान उसकी


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उतारकर उससे हासपरिहास कर बैठें। योगी के लिए यह सभी शंका की बातें हैं, न जाने कब भूतपिशाच उसके कार्य में विघ्न डाल दें। उसे धर्मगरन्थों में यह पॄकर भी शंका होती है कि भगवान नगरों की यात्रा करते थे और अपने शिष्यों के साथ भोजन करते थे। योगियों की आश्रमवाटिका के पुष्प जितने सुन्दर हैं, उतने ही कोमल भी होते हैं, यहां तक कि सांसारिक व्यवहार का एक झोंका भी उन्हें झुलसा सकता है, उनकी मनोरम शोभा को नष्ट कर सकता है। इन्हीं कारणों से पापनाशी नगरों और बस्तियों से


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