असन्तुष्ट हो गये। उनका चित्त अस्थिर हो गया। इसी बीच में मेरे छोटे भाई का उस स्त्री से कुलषित सम्बन्ध हो गया। लेकिन वह स्त्री दोनों भाइयों में किसी को भी न चाहती थी। उसे एक गवैये से परेम था। एक दिन भेद खुल गया। दोनों भाइयों ने गवैये का वध कर डाला। मेरी भावज शोक से अव्यवस्थितचित्त हो गयी। यह तीनों अभागे पराणी बुद्धि को वासनाओं की बलिदेवी पर च़ाकर शहर की गलियों में फिरने लगे। नंगे, सिर के बाल ब़ाये, मुंह से फिचकुर बहाते, कुत्ते की भांति चिल्लाते रहते थे। लड़के उन पर पत्थर फेंकते और उन पर कुत्ते दौड़ाते। अन्त में तीनों मर गये और मेरे पिता ने अपने ही हाथों से उन तीनों को कबर में सुलाया। पिताजी को भी इतना शोक हुआ कि उनका दानापानी छूट गया और वह अपरिमित धन रहते हुए भी भूख से तड़पतड़पकर परलोक सिधारे। मैं एक विपुलसम्पति का वारिस हो गया। लेकिन घर
उसे शेष तेईस शिष्यों के निरीक्षण में छोड़कर, केवल एक ीला ाला चोगा पहने हुए नील नदी की ओर परस्थान किया। उसका विचार था कि लाइबिया होता हुआ मकदूनिया नरेश (सिकन्दर) के बसाये हुए नगर में पहुंच जाऊं। वह भूख, प्यास और थकन की कुछ परवाह न करते हुए परातःकाल से सूयार्स्त तक चलता रहा। जब वह नदी के समीप पहुंचा तो सूर्य क्षितिज की गोद में आश्रय ले चुका था और नदी का रक्तजल कंचन और अग्नि के पहाड़ों के बीच में लहरें मार रहा था।
वह नदी के तटवर्ती