हूं, पर नहीं जानता कि कैसे जलती है और क्यों जलती है ? मित्रवर, तुम व्यर्थ मेरी उपेक्षा करते हो। लेकिन मुझे इसकी भी चिन्ता नहीं कि कोई मुझे क्या समझता है, मेरा मान करता है या निन्दा।'

पापनाशी ने फिर शंका की-'अच्छा एक बात और बता दो। तुम इस निर्जन वन में प्याज और छुहारे खाकर जीवन व्यतीत करते हो ? तुम इतना कष्ट क्यों भोगते हो। तुम्हारे ही समान मैं भी इन्द्रियों का दमन करता हूं और एकान्त में रहता हूं। लेकिन मैं यह सब कुछ ईश्वर को परसन्न करने के लिए, स्वगीर्य आनन्द भोगने के लिए करता हूं। यह एक मार्जनीय उद्देश्य है, परलोकसुख के लिए ही इस लोक में कष्ट उठाना बुद्धिसंगत है। इसके परतिकूल व्यर्थ बिना किसी उद्देश्य के संयम और वरत का पालन करना, तपस्या से शरीर और रक्त तो घुलाना निरी मूर्खता है। अगर मुझे विश्वास न होता-हे अनादि ज्योति, इस दुर्वचन के लिए


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मन में इस समय भीषण संगराम हो रहा था।

उसने सोचा-सन्त पालम की सलाह अच्छी मालूम होती है। वह दूरदर्शी पुरुष हैं। उन्हें मेरे परस्ताव के औचित्य पर संदेह है, तथापि थायस को घात पिशाचों के हाथों में छोड़ देना घोर निर्दयता होगी। ईश्वर मुझे परकाश और बुद्धि दे।

चलतेचलते उसने एक तीतर को जाल में फंसे हुए देखा जो किसी शिकारी ने बिछा रखा था। यह तीतरी मालूम होती थी, क्योंकि उसने एक क्षण में नर को जाल के पास उड़कर और जाल के फन्दे को चोंच से काटते देखा,


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