के बाल सन हो गये थे और शरीर ईंट से भी ज्यादा लाल था। पापनाशी ने साधुओं के परचलित शब्दों में उसका अभिवादन किया-'बन्धु, भगवान तुम्हें शान्ति दे, तुम एक दिन स्वर्ग के आनन्दलाभ करो।'
पर उस वृद्ध पुरुष ने इसका कुछ उत्तर न दिया, अचल बैठा रहा। उसने मानो कुछ सुना ही नहीं। पापनाशी ने समझा कि वह ध्यान में मग्न है। वह हाथ बांधकर उकडूं बैठ गया और सूयार्स्त तक ईशपरार्थना करता रहा। जब अब भी वह वृद्ध पुरुष मूर्तिवत बैठा रहा तो उसने कहा-'पूज्य पिता, अगर आपकी समाधि टूट गयी है तो मुझे परभु मसीह के नाम पर आशीवार्द दीजिए।'
वृद्ध पुरुष ने उसकी ओर बिना ताके ही उत्तर दिया-
'पथिक, मैं तुम्हारी बात नहीं समझा और न परभु मसीह को ही जानता हूं।'
पापनाशी ने विस्मित होकर कहा-'अरे जिसके परति ऋषियों ने भविष्यवाणी की, जिसके नाम पर लाखों आत्माएं
पालम, मेरे परस्ताव का उद्देश्य केवल ईश्वर के माहात्म्य को उज्ज्वल करना है। मुझे अपने सद्परामर्श से अनुगृहीत कीजिए, क्योंकि आप सर्वज्ञ है और पाप की वायु ने कभी आपको स्पर्श नहीं किया।
पालम-बन्धु पापनाशी, मैं इस योग्य भी नहीं हूं कि तुम्हारे चरणों की रज भी माथे पर लगाऊं और मेरे पापों की गणना मरुस्थल के बालुकणों से भी अधिक है। लेकिन मैं वृद्ध हूं और मुझे जो अनुभव है, उससे तुम्हारी सहर्ष सेवा करुंगा।'
पापनाशी-'तो फिर आपसे स्पष्ट कह देने में कोई संकोच नहीं है कि मैं