संचित न हों, पापनाशी ने सलीब का चिह्न बनाया और परभु मसीह का स्मरण किया। तत्क्षण उसने परतिमा के एक कान में से एक चमगादड़ को उड़कर भागते देखा। पापनाशी को विश्वास हो गया कि मैंने उस पिशाच को भगा दिया जो शताब्दियों से इन परतिमा में अड्डा जमाये हुए था। उसका धमोर्त्साह ब़ा, उसने एक पत्थर उठाकर परतिमा के मुख पर मारा। चोट लगते ही परतिमा का मुख इतना उदास हो गया कि पापनाशी को उस पर दया आ गयी। उसने उसे सम्बोधित करके कहा-हे परेत, तू भी उन परेतों की भांति परभु पर ईमान ला जिन्हें परातःस्मरणीय एण्तोनी ने वन में देखा था, और मैं ईश्वर, उसके पुत्र और अलख ज्योति के नाम पर तेरे उद्घार करुंगा।

यह वाक्य समाप्त होते ही सिंफक्स के नेत्रों में अग्निज्योति परस्फुटित हुई, उसकी पलकें कांपने लगीं और उसके ष्पााणमुख से 'मसीह' की ध्वनि निकली; माना पापनाशी के शब्द


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चाहिए कि हमें अपनी शान्ति की छाया में रखे क्योंकि मन को उद्विग्न करने वाले भीषण दुरावेगों से अधिक भयंकर और कोई वस्तु नहीं है। जब यह मनोवेग जागृत हो जाते हैं तो हमारी दशा मतवालों कीसी हो जाती है, हमारे पैर लड़खड़ाने लगते हैं और ऐसा जान पड़ता है कि अब औंधे मुंह गिरे ! कभीकभी इन मनोवेगों के वशीभूत होकर हम घातक सुखभोग में मग्न हो जाते हैं। लेकिन कभीकभी ऐसा भी होता है कि आत्मवेदना और इन्द्रियों की अशांति हमें नैराश्यनद में डुबा देती हैं, जो सुखभोग से कहीं सर्वनाशक


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