है। इन्हीं कारणों से पापनाशी नगरों और बस्तियों से अलगअलग रहता था कि अपने स्वजातीय भाईयों को देखकर उसका चित्त उनकी ओर आकर्षित न हो जाए।
वह निर्जन मार्गों पर चलता था। संध्या समय जब पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता और समीर के मन्द झोंके आने लगते तो अपने कनटोप को आंखों पर खींच लेता कि उस पर परकृतिसौन्दर्य का जादू न चल जाए। इसके परतिकूल भारतीय ऋषिमहात्मा परकृतिसौन्दर्य के रसिक होते थे। एक सप्ताह की यात्रा के बाद वह सिलसिल नाम के स्थान पर पहुंचा। वहां नील नदी एक संकरी घाटी में होकर बहती है और उसके तट पर पर्वतश्रेणी की दुहरी मेंड़सी बनी हुई है। इसी स्थान पर मिस्त्रनिवासी अपने पिशाचपूजा के दिनों में मूर्तियां अंकित करते थे। पापनाशी को एक बृहदाकार 'स्फिक्र्स'* ठोस पत्थर का बना हुआ दिखाई दिया। इस भय से कि इस परतिमा में अब भी पैशाचिक विभूतियां
हैं। हमारा धर्म है कि अपने सम्भाषणों में भी ईश्वर की स्तुति ही किया करें। मैं इस समय ईश्वर की कीर्ति परसारित करने के लिए एक परस्ताव लेकर आपकी सेवा में उपस्थिति हुआ हूं।
पालम-'बन्धु पापनाशी, भगवान तुम्हारे परस्ताव को मेरे काहू के बेलों की भांति सफल करे। वह नित्य परभात को मेरी वाटिका पर ओसबिन्दुओं के साथ अपनी दया की वर्षा करता है और उसके परदान किए हुए खोरों और खरबूजों का आस्वादन करके मैं उसके असीम वात्सल्य की जयजयकार मानता हूं। उससे यही याचना करनी