अस्तित्व है। उसे पराप्त करने के लिए हमें पहले अपने अस्तित्व को मिटा देना चाहिए। यह एक ऐसी विपत्ति है जिससे परमेश्वर भी मुक्त नहीं, क्योंकि दर्शनों के ज्ञाता और भक्त उसे सम्पूर्ण और सिद्ध परमाणित करने में एड़ीचोटी का जोर लगा रहे हैं। सारांश यह है कि यदि हमें 'अस्ति' का कुछ बोध नहीं तो, 'नास्ति' से भी हम उतने ही अनभिज्ञ हैं। हम कुछ जानते ही नहीं।'
कोटा-'मुझे भी दर्शन से परेम है और अवकाश के समय उसका अध्ययन किया करता हूं। लेकिन इसकी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं। हां, सिसरो* के गरन्थों में अवश्य इसे खूब समझ लेता हूं। रासो, कहां मर गये, मधुमिश्रित वस्तु प्यालों में भरो।'
कलित्र्कान्त-'यह एक विचित्र बात है, लेकिन न जाने क्यों जब मैं क्षुधातुर होता हूं तो मुझे उस नाटक रचने वाले कवियों की याद आती है जो बादशाहों की मेज पर भोजन किया करते थे और मेरे मुंह में
हो।' दोनों पर छः महीने तक यह नशा सवार रहा। अन्त में टूट गया। थायस को ऐसा जान पड़ता कि मेरा हृदय शून्य और निर्जन है। वहां से कोई चीज गायब हो गयी है। लोलस उसकी दृष्टि में कुछ और मालूम होता था। वह सोचती-मुझमें सहसा यह अन्तर क्यों हो गया ? यह क्या बात है कि लोलस अब और मनुष्यों कासा हो गया है, अपनासा नहीं रहा ? मुझे क्या हो गया है ?
यह दशा उसे असह्य परतीत होने लगी। अखण्ड परेम के आस्वादन के बाद अब यह नीरस, शुष्क व्यापार उसकी