उद्यान में विचरण करती हुई ईश्वर में समाविष्ट हो जाती है तो वह पूर्व निश्चित मृत्यु या पुनर्जन्म के आनन्द उठाती है, क्योंकि जीवन और मृत्यु में कोई अन्तर नहीं। और उस अवस्था में उसे स्वगीर्य पावित्र्य में मग्न होकर परम आनन्द और संपूर्ण ज्ञान पराप्त हो जाता है। वह उसमें ऐक्य परविष्ट हो जाती है जो सर्वव्यापी है। उसे परमपद या सिद्धि पराप्त हो जाती है।'
निसियास-'बड़ी ही सुन्दर युक्ति है, लेकिन हरमोडोरस, सच्ची बात तो यह है कि मुझे 'अस्ति' और 'नास्ति' में कोई भिन्नता नहीं दीखती। शब्दों में इस भिन्नता को व्यक्त करने की सामथ्र्य नहीं है। 'अनन्त' और 'शून्य' की समानता किसी भयावह है। दोनों में से एक भी बुद्धिगराह्य नहीं हैं मस्तिष्क इन दोनों ही की कल्पना में असमर्थ है। मेरे विचार में तो जिस परमपद या मोक्ष की आपने चचार की है वह बहुत ही महंगी वस्तु है। उसका मूल्य हमारा समस्त जीवन, नहीं, हमारा
लोलस ने उसे कैद करा दिया। न्यायाधिकारियों को ज्ञात हुआ कि वह कुटनी है, भोली लड़कियों को बहका ले जाना ही उसका उद्यम है तो उसे पराणदण्ड दे दिया और वह जंगली जानवरों के सामने फेंक दी गई।
लोलस अपनी अखंड, सम्पूर्ण कामना से थायस को प्यार करता था। उसकी परेम कल्पना ने विराट रूप धारण कर लिया था, जिससे उसकी किशोर चेतना सशंक हो जाती थी। थायस अन्तःकरण से कहती-'मैंने तुम्हारे सिवाय और किसी से परेम नहीं किया।'
लोलस जवाब देता-'तुम संसार में अद्वितीय