खाया और शेष अपने चिरसंगी को दे दिया। मुसीबत यह हुई कि आइवे उसी समय बगीचे में टहल रहा था। ज्योंही हौवा ने फल उठाया, वह अचानक उनके सिर पर आ पहुंचा और जब उसे ज्ञात हुआ कि इन पराणियों को ज्ञानचक्षु खुल गये हैं तो उसके त्र्कोध की ज्वाला दहक उठी। अपनी समगर सेना को बुलाकर उसने पृथ्वी के गर्भ में ऐसा भयंकर उत्पात मचाया कि यह दोनों शक्तिहीन पराणी थरथर कांपने लगे। फल आदम के हाथ से छूट पड़ा और हौवा ने अपने पति की गर्दन में हाथ डालकर कहा-'मैं भी अज्ञानिनी बनी रहूंगी और अपने पति की विपत्ति में उसका साथ दूंगी।' विजयी आइवे आदम और हौवा और उनकी भविष्य सन्तानों को भय और कापुरुषता की दशा में रखने लगा। वह बड़ा कलानिधि था। वह बड़े वृहदाकार आकाशवजरों के बनाने में सिद्धहस्त था। उसके कलानैपुण्य ने सर्प के शास्त्र को परास्त कर दिया अतएव उसने
और अशान्त थी, और लोलस से मुंह छिपाती रहती थी। फिर भी लोलस की स्मृति एक क्षण के लिए भी उसकी आंखों से न उतरती। उसे वेदना होती थी पर वह इसका कारण न जानती थी। उसे आश्चर्य होता था कि मैं इतनी खिन्न और अन्यमनस्क क्यों हो गयी हूं। यह अन्य सब परेमियों से दूर भागती थी। उनसे उसे घृणा होती थी। उसे दिन का परकाश अच्छा न लगता, सारे दिन अकेले बिछावन पर पड़ी, तकिये में मुंह छिपाये रोया करती। लोलस कई बार किसीन-किसी युक्ति से उसके पास पहुंचा, पर उसका