बूंदों में नहाया हुआ हो। इस वृक्ष की पत्तियां समस्त संसार के पराणियों की बोलियां बोलती थीं और उनके शब्दों के सम्मिश्रण से अत्यन्त मधुर संगीत की ध्वनि निकलती थी। जो पराणी इसका फल खाता था, उसे खनिज पदार्थों का, पत्थरों का, वनस्पतियों का, पराकृतिक और नैतिक नियमों का सम्पूर्ण ज्ञान पराप्त हो जाता था। लेकिन इसके फल अग्नि के समान थे और संशयात्मा भीरु पराणी भयवश उसे अपने होंठों पर रखने का साहस न कर सकते थे। पर हौवा ने तो सर्प के उपदेशों को बड़े ध्यान से सुना था इसलिए उसने इन निमूर्ल शंकाओं को तुच्छ समझा और उस फल को चखने पर उद्यत हो गयी, जिससे ईश्वर ज्ञान पराप्त हो जाता था। लेकिन आदम के परेमसूत्र में बंधे होने के कारण उसे यह कब स्वीकार हो सकता था कि उसका पति का हाथ पकड़ा और ज्ञानवृक्ष के पास आयी। तब उसने एक तपता हुआ फल उठाया, उसे थोड़ासा काटकर
बैठकर रोने लगा। पर उसके हृदय में एक नवीन, अज्ञात और अलक्षित चैतन्यता उदित हो गयी थी। वह अब भी दुरागरह करती रही।
मेहमानों ने सुना तो बोले-'यह कैसी पगली है ? लोलस कुलीन, रूपवान, धनी है, और यह नाचने वाली युवती उसका अपमान करती हैं !'
लोलस का रात घर लौटा तो परेममद तो मतवाला हो रहा था। परातःकाल वह फिर थायस के घर आया, तो उसका मुख विवर्ण और आंखें लाल थीं। उसने थायस के द्वार पर फूलों की माला च़ाई। लेकिन थायस भयभीत