बुद्धि और अनुमान द्वारा गरहण नहीं किये जा सकते, बल्कि अन्तज्योर्ति द्वारा किये जाते हैं। यही कारण है कि स्त्रियां जो पुरुषों की भांति सहनशील नहीं होती हैं पर जिनकी चेतनाशक्ति अधिक तीवर होती है, ईश्वरविषयों को आसानी से समझ जाती है। स्त्रियों को सत्स्वप्न दिखाई देते हैं, पुरुषों को नहीं। स्त्री का पुत्र या पति दूर देश में किसी संकट में पड़ जाए तो स्त्री को तुरन्त उसकी शंका हो जाती है। देवताओं का वस्त्र स्त्रियों कासा होता है, क्या इसका कोई आशय नहीं है ? इसलिए सर्प की यह दूरदर्शिता थी कि उसने ज्ञान का परकाश डालने के लिए मन्दबुद्धि आदम को नहीं; बल्कि चैतन्यशील हौवा को पसन्द किया, जो नक्षत्रों से उज्ज्वल और दूध से स्निग्ध थी। हौवा ने सर्प के उपदेश को सहर्ष सुना और ज्ञानवृक्ष के समीप जाने पर तैयार हो गयी, जिसकी शाखाएं स्वर्ग तक सिर उठाये हुए थीं और जो ईश्वरीय दया से इस भांति आच्छादित था, मानो ओस की
कि उसका रूप मनोहर है। अकस्मात उसे अपने माथे पर ठंडा पसीना बहता हुआ जान पड़ा। वह हरी घास की भांति आर्द्र हो गयी। उसके सिर में चक्कर आने लगे, आंखों के सामने मेघघटासी उठती हुई जान पड़ी। युवक ने फिर वही परेमाकांक्षा परकट की, लेकिन थायस ने फिर इनकार किया। उसके आतुर नेत्र, उसकी परेमयाचना बस निष्फल हुई, और जब उसने अधीर होकर उसे अपनी गोद में ले लिया और बलात खींच ले जाना चाहा तो उसने निष्ठुरता से उसे हटा दिया। तब वह उसके सामने