किया करती थी, जिसमें पहले खुद दीक्षित होकर तब अपने पति को दीक्षित करे....'

डोरियन-'महाशय जेनाथेमीज, क्षमा कीजिएगा, आपकी बात काटता हूं। आपका यह कथन सुनकर मुझे शंका होती है कि सर्प उतना बुद्धिमान और विचारशील न था जितना आपने उसे बताया है। यदि वह ज्ञानी होता तो क्या वह इस ज्ञान को हौवा के छोटे से मस्तिष्क में आरोपित करता जहां काफी स्थान न था ? मेरा विचार है कि वह आइवे के समान ही मूर्ख और कुटिल था और हौवा को एकान्त में इसीलिए उपदेश देता था कि स्त्री को बहकाना बहुत कठिन न था। आदमी अधिक चतुर और अनुभवशील होने के कारण, उसकी बुरी नीयत को ताड़ लेता। यहां उसकी दाल न गलती इसलिए मैं सर्प की साधुता का कायल हूं, न कि उसकी बुद्धिमत्ता का।'

जेनाथेमीज-'डोरियन, तुम्हारी शंका निमूर्ल है। तुम्हें यह नहीं मालूम है कि जीवन के सवोर्च्च और गू़तम रहस्य


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हुई पुष्पमाला या तेरे कोमल शरीर का आभूषण, अथवा तेरे चरणों की पादुका मैं होता। यह मेरी परम लालसा है कि पादुका की भांति तेरे सुन्दर चरणों से कुचला जाता, मेरा परेमालिंगन तेरे सुकोमल शरीर का आभूषण और तेरी अलकराशि का पुष्प होता। सुन्दरी रमणी, मैं पराणों को हाथ में लिये तेरी भेंट करने को उत्सुक हो रहा हूं। मेरे साथ चल और हम दोनों परेम में मग्न होकर संसार को भूल जायें।'

जब तक वह बोलता रहा, थायस उसकी ओर विस्मित होकर ताकती रही। उसे ज्ञात हुआ


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