वाले पराणियों को भयंकर पिशाचलीलाओं से, शंकोत्पादक त्र्कोध से और मेघगर्जनों से भयभीत कर दिया। आदम और हौवा अपने ऊपर उसकी छाया का अनुभव करके एकदूसरे से चिमट गये और भय ने उनके परेम को और भी घनिष्ठ कर दिया। उस समय उस विराट संसार में कोई उनकी रक्षा करने वाला न था। जिधर आंख उठाते थे, उधर सन्नाटा दिखाई देता था। सर्प को उनकी यह निस्सहाय दशा देखकर दया आ गयी और उसने उनके अन्तःकरण को बुद्धि के परकाश से आलोकित करने का निश्चय किया, जिसमें ज्ञान से सतर्क होकर वह मिथ्या, भय, और भयंकर परेतलीलाओं से चिन्तित न हों। किन्तु इस कार्य को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए बड़ी सावधानी और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता थी और पूर्व दम्पति की सरलहृदयता ने इसे और भी कठिन बना दिया। किन्तु दयालु सर्प से न रहा गया। उसने गुप्त रूप से इन पराणियों के उद्घार
शहर में आयी तो उसने रईसों से थायस की खूब परशंसा की। थायस का रूपलावण्य देखकर लोगों ने बड़े चाव से उसे अपनी रागरंग की मजलिसों में निमन्त्रित किया, और उसके नृत्यगान पर मोहित हो गये। शनै:शनै: यही उसका नित्य का काम हो गया! नृत्यगान समाप्त होने पर वह परायः सेठसाहूकारों के साथ नदी के किनारे, घने कुञ्जों में विहार करती। उस समय तक उसे परेम के मूल्य का ज्ञान न था, जो कोई बुलाता उसके पास जाती, मानो कोई जौहरी का लड़का धनराशि को कौड़ियों की भांति लुटा रहा