सोने के परों कासा सर्प जो ज्ञानवृद्ध से लिपटा हुआ था, परेम और परकाश से बनाया था। इन दोनों शक्तियों में एक परकाश की थी और दूसरी अंधकार की थी-विरोध होना अनिवार्य था। यह घटना संसार की घटनासृष्टि के थोड़े ही दिनों पश्चात घटी। दोनों विरोधी शक्तियों से युद्ध छिड़ गया। ईश्वर अभी कठिन परिश्रम के बाद विश्राम न करने पाये थे; आदम और हौवा, आदि पुरुष, आदि स्त्री, अदन के बाग में नंगे घूमते और आनन्द से जीवन व्यतीत कर रहे थे। इतने में दुर्भाग्य से आइवे को सूझी कि इन दोनों पराणियों पर और उनकी आने वाली सन्तानों पर आधिपत्य जमाऊं। तुरन्त अपनी दुरिच्छा को पूरा करने का परयत्न वह करने लगा। वह न गणित में कुशल था, न संगीत में; न उस शास्त्र से परिचति था। जो राज्य का संचालन करता है; न उस ललितकला से जो चित्त को मुग्ध करती है। उसने इन दोनों सरल बालकों कीसी बुद्धि रखने
बल्कि इसलिए कि इस तरकीब से वह जी भरकर थायस को गालियां दे सकता था। जब उसने देखा कि थायस नाचनेगाने में निपुण होती जाती है और रसिक लोग उसके नृत्यगान से जितने मुग्ध होते हैं उतना मेरे नृत्यकौशल से नहीं होते तो उसकी छाती पर सांप काटने लगा। वह उसके गालों को नोच लेता, उसके हाथपैर में चुटकियां काटता। पर उसकी जलन से थायस को लेशमात्र भी दुःख न होता था। निर्दय व्यवहार का उसे अभ्यास हो गया था। अन्तियोकस उस समय बहुत आबाद शहर था। मीरा जब इस