के विवेचन से पराप्त होगा, जिनके वह अनुयायी हैं, उतना और विषय से नहीं हो सकता। मैं स्वयं इस विवेचन का पक्षपाती हूं, क्योंकि इसमें कितने ही सवारंगसुन्दर और विचित्र रूपकों का समावेश है जो मुझे अत्यन्त पिरय हैं। अगर शब्दों से आशय का अनुमान किया जा सकता है, तो ईसाई सिद्घान्तों में सत्य की मात्रा परचुर है और ईसाई धर्मगरन्थ ईश्वरज्ञान से परिपूर्ण है। लेकिन सन्त पापनाशी, मैं यहूदी धर्मगरन्थों को इनके समान सम्मान के योग्य नहीं समझता। उनकी रचना ईश्वरीय ज्ञान द्वारा नहीं हुई है, वरन एक पिशाच द्वारा जो ईश्वर का महान शत्रु था। इसी पिशाच ने, जिसका नाम आइवे था उन गरन्थों को लिखवाया। वह उन दुष्टात्माओं में से था जो नरकलोक में बसते हैं और उन समस्त विडम्बनाओं के कारण हैं जिनसे मनुष्य मात्र पीड़ित हैं। लेकिन आइवे अज्ञान, कुटिलता और त्र्कूरता में उन सबों से ब़कर था। इसके विरुद्ध,


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रमणी होगी। उसने उसे कोड़े मारकर संगीत और पिंगल की शिक्षा दी। जब सितार के तालों के साथ उसके पैर न उठते तो वह उसकी कोमल पिंडलियों में चमड़े के तस्में से मारती। उसका पुत्र जो हिजड़ा था, थायस से द्वेष रखता था, जो उसे स्त्री मात्र से था। पर वह नाचने में, नकल करने में, मनोगत भावों को संकेत, सैन, आकृति द्वारा व्यक्त करने में, परेम की घातों के दर्शाने में, अत्यन्त कुशल था। हिजड़ों में यह गुण परायः ईश्वरदत्त होते हैं। उसने थायस को यह विद्या सिखाई, खुशी से नहीं,


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