हैं। हमारे बीच में वह किसी दिव्य पुरुष की परतिभा की भांति गम्भीर, परौ़, श्वेत खड़े हैं। उनके लिए मेला भी निर्जन, शान्त स्थान है और उनके मुख से जो शब्द निकलते हैं वह किसी के कानों में नहीं पड़ते।'
यूक्राइटीज-'डोरियन, यह तुम्हारा भरम है। सत्य विवेचन अभी संसार से लुप्त नहीं हुआ है। इस्कन्द्रिया, रोम, कुस्तुन्तुनिया आदि स्थानों में मेरे कितने ही अनुयायी हैं। गुलामों की एक बड़ी संख्या और कैसर के कई भतीजों ने अब यह अनुभव कर लिया है कि इन्द्रियों का क्योंकर दमन किया जा सकता है, स्वच्छन्द जीवन कैसे उपलब्ध हो सकता है ? वह सांसारिक विषयों से निर्लिप्त रहते हैं, और असीम आनन्द उठाते हैं। उनमें से कई मनुष्यों ने अपने सत्कर्मों द्वारा एपिक्टीटस और मार्कस ऑरेलियस का पुनः संस्कार कर दिया है। लेकिन अगर यही सत्य हो कि संसार से सत्कर्म सदैव के लिए उठ गया, तो इस क्षति से मेरे आनन्द में
माता उसे मारापीटा करती थी। माता की मार से बचने के लिए वह बहुधा घर से भाग जाती और शहरपनाह की दीवार की दरारों में वन्य जन्तुओं के साथ छिपी रहती।
एक दिन उसकी माता ने इतनी निर्दयता से उसे पीटा कि वह घर से भागी और शहर के फाटक के पास चुपचाप पड़ी सिसक रही थी कि एक बुयि उसके सामने जाकर खड़ी हो गयी। वह थोड़ी देर तक मुग्धभाव से उसकी ओर ताकती रही और तब बोली-'ओ मेरी गुलाब, मेरी गुलाब, मेरी फूलसी बच्ची ! धन्य है तेरा पिता जिसने तुझे