पुरुष, जिसकी सूरत से विचारशीलता झलकती थी और जो वेशवस्त्र से बहुत सुव्यवस्थित न जान पड़ता था, मस्तिष्क गर्व से उठाये मन्दगति से चलता हुआ कमरे में आया। कोटा ने अपने ही गद्दे पर उसे बैठने का संकेत किया और बोला- 'यूक्राइटीज, तुम खूब आये। तुम्हें यहां देखकर चित्तबहुत परसन्न हुआ। इस मास में तुमने दर्शन पर कोई नया गरन्थ लिखा ? अगर मेरी गणना गलत नहीं है तो यह इस विषय का 92वां निबन्ध है जो तुम्हारी लेखनी से निकला है। तुम्हारी नरकट की कलम में बड़ी परतिभा है। तुमने यूनान को भी मात कर दिया।'
यूक्राइटीज ने अपनी श्वेत दा़ी पर हाथ फेरकर कहा-'बुलबुल का जन्म गाने के लिए हुआ है। मेरा जन्म देवताओं की स्तुति के लिए, मेरे जीवन का यही उद्देश्य है।'
डोरियन-'हम यूक्राइटीज को बड़े आदर के साथ नमस्कार करते हैं, जो विरागवादियों में जब अकेले ही बच रहे
लिए तैयार रहे। यहां सज्जनता का दण्ड अवश्य मिलता है। उसे सत्कर्म से भय होता था कि कहीं मेरी भी यही दशा न हो। उसका कोमल शरीर पीड़ा सहने में असमर्थ था
वह छोटी ही उमर में बादशाह के युवकों के साथ क्रीड़ा करने लगी। संध्या समय वह बू़े आदमियों के पीछे लग जाती और उनसे कुछन-कुछ ले मरती थी। इस भांति जो कुछ मिलता उससे मिठाइयां और खिलौने मोल लेती। पर उसकी लोभिनी माता चाहती थी कि वह जो कुछ पाये वह मुझे दे। थायस इसे न मानती थी। इसलिए उसकी