क्या कहा कि देवगण तुम्हें प्यार करते हैं। तब तो वह मनुष्यों ही की भांति सुखदुख का अनुभव कर सकते होंगे। यह निर्विवाद है कि परेम से पीड़ित मनुष्य को कष्टों का सामना अवश्य करना पड़ता है, और उसके वशीभूत हो जाना मानसिक दुर्बलता का चिह्न है। ड्रोसिया के परति देवगणों को जो परेम है, इससे उनकी दोषपूर्णता सिद्ध होती है।'
ड्रोसिया यह व्याख्या सुनकर बिगड़ गयी और बोली-'निसियास, तुम्हारा तर्क सर्वथा अनर्गल और तत्त्वहीन है। लेकिन वह तो तुम्हारा स्वभाव ही है। तुम बात तो समझते नहीं, ईश्वर ने इतनी बुद्धि ही नहीं दी, और निरर्थक शब्दों में उत्तर देने की चेष्टा करते हो।'
निसियास मुस्कराया-'हां, हां, ड्रोसिया, बातें किये जाओ चाहे वह गालियां ही क्यों न हों। जबजब तुम्हारा मुंह खुलता है, हमारे नेत्र तृप्त हो जाते हैं। तुम्हारे दांतों की बत्तीसी कितनी सुन्दर है-जैसे मोतियों की माला !'
इतने में एक वृद्ध
ने महात्मा थियोडोर की कीर्ति को परमाज्ज्वल अक्षरों में अंकित किया।
अहमद के पराणदण्ड के समय थायस का ग्यारहवां वर्ष पूरा हो चुका था। इस घटना से उसके हृदय को गहरा सदमा पहुंचा। उसकी आत्मा अभी इतनी पवित्र न थी कि वह अहमद की मृत्यु को उसके जीवन के समान ही मुबारक समझती, उसकी मृत्यु को उद्घार समझकर परसन्न होती। उसके अबोध मन में यह भरान्त बीज उत्पन्न हुआ कि इस संसार में वही पराणी दयाधर्म का पालन कर सकता है जो कठिनसे-कठिन यातनाएं सहने के