खाली करके कहा-'देश का इतना सम्मान क्यों ? देश है क्या ? एक बहती हुई नदी। किनारे बदलते रहते हैं और जल में नित नयी तरंगें उठती रहती हैं।
जलसेनानायक ने उत्तर दिया-'डोरियन, मुझे मालूम है कि तुम नागरिक विषयों की परवाह नहीं करते और तुम्हारा विचार है कि ज्ञानियों को इन वस्तुओं से अलगअलग रहना चाहिए। इसके परतिकूल मेरा विचार है कि एक सत्यवादी पुरुष के लिए सबसे महान इच्छा यही होनी चाहिए कि वह सामराज्य में किसी पद पर अधिष्ठित हो। सामराजय एक महत्वशाली वस्तु है।'
देवालय के अध्यक्ष हरमोडोरस ने उत्तर दिया-'डोरियन महाशय ने जिज्ञासा की
है कि स्वदेश क्या है ? मेरा उत्तर है कि देवताओं की बलिवेदी और पितरों के समाधिस्तूप ही स्वदेश के पयार्प हैं। नागरिकता समृतियों और आशाओं के समावेश से उत्पन्न होती है।'
युवक एरिस्टोबोलस ने बात काटते हुए कहा-'भाई,
गये, तो उसने 'उफ' तक न किया, और एक भी अपशब्द उसके मुंह से न निकला ! अन्त में बोला-'मैं प्यासा हूं !
तीन दिन और तीन रात उसे असह्य पराणपीड़ा भोगनी पड़ी। मानवशरीर इतना दुस्सह अगंविच्छेद सह सकता है, असम्भवसा परतीत होता था। बारबार लोगों को खयाल होता था कि वह मर गया। मक्खियां आंखों पर जमा हो जातीं, किन्तु सहसा उसके रक्तवर्ण नेत्र खुल जाते थे। चौथे दिन परातःकाल उसने बालकों केसे सरल और मृदुस्वर में गाना शुरू किया-मरियम, बता तू कहा गयी