फिलिना और ड्रोसिया की टकटकी थायस पर लगी हुई थी, मानो वे उसका भक्षण कर लेंगी। उसने अपने केशों में बनशे के पीलेपीले फूलों का हार गूंथा था, जिसका परत्येक फूल उसकी आंखों की हल्की आभा की सूचना देता था। इस भांति के फूल तो उसकी कोमल चितवनों के सदृश थीं। इस रमणी की छवि में यही विशेषता थी। इसकी देह पर परत्येक वस्तु खिल उठती थी। सजीव हो जाती थी। उसके चांदी के तारों से सजी हुई पेशवाज के पांयचे फर्श पर लहराते थे। उसके हाथों में न कंगन थे, न गले में हार। इस आभूषणहीन छवि में ज्योत्स्ना की म्लान शोभा थी, एक मनोहर उदासी, जो कृत्रिम बनावसंवार से अधिक चित्ताकर्षक होती है ! उसके सौन्दर्य का मुख आधार उसकी दो खुली हुई नर्म, कोमल, गोरीगोरी बांहें थी। फिलिना और ड्रोसिया को भी विवश होकर थायस के जूड़े और पेशवाज की परशंसा करनी पड़ी, यद्यपि उन्होंने थायस से इस


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उसका धमोर्त्साह दिनोंदिन ब़ने लगा। कभीकभी वह बाजार में ईसाइयों को जमा करके उन्हें आने वाले सुखों की शुभ सूचना देता। उसकी सूरत देखते ही शहर के भिखारी, मजदूर, गुलाम, जिनका कोई आश्रय न था, जो रातों में सड़क पर सोते थे, एकत्र हो जाते और वह उनसे कहता-'गुलामों के मुक्त होने के बदन निकट हैं, न्याय जल्द आने वाला है, धन के मतवाले चैन की नींद न सो सकेंगे। ईश्वर के राज्य में गुलामों को ताजा शराब और स्वादिष्ट फल खाने को मिलेंगे, और धनी लोग कुत्ते की भांति दुबके


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