बोला-'ईसाई धर्म के अनुगामी संत पापनाशी का मैं हृदय से स्वागत करता हूं। मैं स्वयं उस मत का सम्मान करता हूं जो अब सामराज्यव्यापी हो गया है। श्रद्धेय महाराज कॉन्सटैनटाइन ने तुम्हारे सहधर्मियों को सामराज्य के शुभेच्छकों की परथम श्रेणी में स्थान परदान किया है। लेटिन जाति की उदारता का कर्त्तव्य है कि वह तुम्हारे परभु मसीह को अपने देवमन्दिर में परतिष्ठत करे। हमारे पुरखों का कथन था कि परत्येक देवता में कुछन-कुछ अंश ईश्वर का अवश्य होता है। लेकिन यह इन बातों का समय नहीं है। आओ, प्याले उठायें और जीवन का सुख भोगें। इसके सवा और सब मिथ्या है।'
वयोवृद्ध कोटा बड़ी गम्भीरता से बोलते थे। उन्होंने आज एक नये परकार की नौका का नमूना सोचा था और अपने 'कार्थेज जाति का इतिहास' का छठवां भाग समाप्त किया था। उन्हें संष्तोा था कि आज का दिन सफल हुआ, इसलिए वह बहुत परसन्न थे।
एक
ने परसन्नता से इस परस्ताव को स्वीकार किया। लोग बिशप के घर आये। इसमें केवल एक कमरा था। दो चरखे रखे हुए थे और एक फटी हुई दरी बिछी थी। जब यह लोग अन्दर पहुंचे तो बिशप ने नीतिदा से कहा-'चूल्हा और तेल की बोतल लाओ। भोजन बनायें।'
यह कहकर उसने कुछ मछलियां निकालीं, उन्हें तेल में भूना, तब सबके-सब फर्श पर बैठकर भोजन करने लगे। बिशप ने अपनी यन्त्रणाओं का वृत्तान्त कहा और ईसाइयों की विजय पर विश्वास परकट किया। उसकी भाषा बहुत ही