को नमस्कार !
दूसरा बोला-उस देवी को नमस्कार जो अपनी मुखाकृति से मन के समस्त भावों को परकट कर सकती है।
तीसरा बोला-देवता और मनुष्य की लाड़ली को सादर परणाम !
चौथे ने कहा-उसको नमस्कार जिसकी सभी आकांक्षा करते हैं !
पांचवां बोला-उसको नमस्कार जिसकी आंखों में विष है और उसका उतार भी।
छठा बोला-स्वर्ग के मोती को नमस्कार !
सातवां बोला-इस्कन्द्रिया के गुलाब को नमस्कार !
थायस मन में झुंझला रही थी कि अभिवादनों का यह परवाह कब शान्त होता है। जब लोग चुप हुए तो उसने गृहस्वामी कोटा से कहा-'लूशियस, मैं आज तुम्हारे पास एक मरुस्थलनिवासी तपस्वी लायी हूं जो धमार्श्रम के अध्यक्ष हैं। इनका नाम पापनाशी है। यह एक सिद्धपुरुष हैं जिनके शब्द अग्नि की भांति उद्दीपक होते हैं।'
लूशियस ऑरेलियस कोटा ने, जो जलसेना का सेनापति था, खड़े होकर पापनाशी का सम्मान किया और
तब नीतिदा ने देह का पानी पोंछकर अपना सफेद वस्त्र पहना दिया। इस परकार वह बालिका ईसा शरण में आयी जो कितनी परीक्षाओं और परलोभनों के बाद अमर जीवन पराप्त करने वाली थी।
जब यह संस्कार समाप्त हो गया और सब लोग खोह के बाहर निकले तो अहमद ने बिशप से कहा-'पूज्य पिता, हमें आज आनन्द मनाना चाहिए; क्योंकि हमने एक आत्मा को परभु मसीह के चरणों पर समर्पित किया। आज्ञा हो तो हम आपके शुभस्थान पर चलें और शेष रात्रि उत्सव मनाने में काटें।'
बिशप