वह परायः सेठसाहूकारों के साथ नदी के किनारे, घने कुञ्जों में विहार करती। उस समय तक उसे परेम के मूल्य का ज्ञान न था, जो कोई बुलाता उसके पास जाती, मानो कोई जौहरी का लड़का धनराशि को कौड़ियों की भांति लुटा रहा हो। उसका एकएक कटाक्ष हृदय को कितना उद्विग्न कर देता है, उसका एकएक कर स्पर्श कितना रोमांचकारी होता है, यह उसके अज्ञात यौवन को विदित न था।
एक रात को उसका मुजरा नगर के सबसे धनी रसिक युवकों के सामने हुआ। जब नृत्य बन्द हुआ तो नगर के परधान राज्यकर्मचारी का बेटा, जवानी की उमंग और कामचेतना से विह्वल होकर उसके पास आया और ऐसे मधुर स्वर में बोला जो परेमरस में सनी हुई थी-
'थायस, यह मेरा परम सौभाग्य होता यदि तेरे अलकों में गुंथी हुई पुष्पमाला या तेरे कोमल शरीर का आभूषण, अथवा तेरे चरणों की पादुका मैं होता। यह मेरी परम लालसा
थी, और वह झुलसती हुई भूमि उनके पैरों से कोमल तृण के समान दब जाती थी। यह देखकर पापनाशी की क्रोधाग्नि जोर से भड़क उठी। उसने चिल्लाकर कहा-ईश्वर, इस दुराचारी पर वजरघात कर ! यह निसियास है। उसे ऐसा कुचल कि वह रोये, कराहे और क्रोध से दांत पीसे। उसने थायस को भरष्ट किया है।
सहसा पापनाशी की आंखंें खुल गईं। वह एक बलिष्ठ मांझी की गोद में था। मांझी बोला-'बस मित्र, शान्त हो जाओ। जल देवता साक्षी है कि तुम नींद में बुरी तरह चौंक पड़ते हो। अगर