पूरा हो चुका था। इस घटना से उसके हृदय को गहरा सदमा पहुंचा। उसकी आत्मा अभी इतनी पवित्र न थी कि वह अहमद की मृत्यु को उसके जीवन के समान ही मुबारक समझती, उसकी मृत्यु को उद्घार समझकर परसन्न होती। उसके अबोध मन में यह भरान्त बीज उत्पन्न हुआ कि इस संसार में वही पराणी दयाधर्म का पालन कर सकता है जो कठिनसे-कठिन यातनाएं सहने के लिए तैयार रहे। यहां सज्जनता का दण्ड अवश्य मिलता है। उसे सत्कर्म से भय होता था कि कहीं मेरी भी यही दशा न हो। उसका कोमल शरीर पीड़ा सहने में असमर्थ था
वह छोटी ही उमर में बादशाह के युवकों के साथ क्रीड़ा करने लगी। संध्या समय वह बू़े आदमियों के पीछे लग जाती और उनसे कुछन-कुछ ले मरती थी। इस भांति जो कुछ मिलता उससे मिठाइयां और खिलौने मोल लेती। पर उसकी लोभिनी माता चाहती थी कि वह जो कुछ पाये वह मुझे
कंठ को लाल लोहे की सलाखों से छेद रहे थे। यह अमर कवि होमर की परतिच्छाया थी। वह इतना कष्ट झेलकर भी गाने से बाज न आती थी। उसके समीप ही अनकगोरस, जिसके सिर के बाल गिर गये थे, धूल में परकाल से शक्लें बना रहा था। एक दैत्य उसके कानों में खौलता हुआ तेल डाल रहा था; पर उसकी एकागरता को भंग न कर सकता था। इसके अतिरिक्त पापनाशी को और कितनी ही आत्माएं दिखाई दीं जो जलती हुई नदी के किनारे बैठी हुई उसी भांति पठनपाठन, वादपरतिवाद, उपासनाध्यान