होता था कि वह मर गया। मक्खियां आंखों पर जमा हो जातीं, किन्तु सहसा उसके रक्तवर्ण नेत्र खुल जाते थे। चौथे दिन परातःकाल उसने बालकों केसे सरल और मृदुस्वर में गाना शुरू किया-मरियम, बता तू कहा गयी थी, और वहां क्या देखा? तब उसने मुस्कराकर कहा-
'वह स्वर्ग के दूत तुझे लेने को आ रहे हैं। उनका मुख कितना तेजस्वी है। वह अपने साथ फल और शराब लिये आते हैं। उनके परों से कैसी निर्मल, सुखद वायु चल रही है।'
और यह कहतेकहते उसका पराणान्त हो गया।
मरने पर भी उसका मुखमंडल आत्मोल्लास से उद्दीप्त हो रहा था। यहां तक कि वे सिपाही भी जो सलीब की रक्षा कर रहे थे, विस्मत हो गये। बिशप जीवन ने आकर शव का मृतकसंस्कार किया और ईसाई समुदाय ने महात्मा थियोडोर की कीर्ति को परमाज्ज्वल अक्षरों में अंकित किया।
अहमद के पराणदण्ड के समय थायस का ग्यारहवां वर्ष
रही थी। वहां धुंधले परकाश में नरक के दूत पापात्माओं को कष्ट दे रहे थे। इन आत्माओं पर उनके मृत शरीर का हलका आवरण था, यहां तक कि वह कुछ वस्त्र भी पहने हुए थी। ऐसे दारुण कष्टों में भी यह आत्माएं बहुत दुःखी न जान पड़ती थीं। उनमें से एक जो लम्बी, गौरवर्ण, आंखें बन्द किये हुए थी, हाथ में एक तलवार लिये जा रही थी। उसके मधुर स्वरों से समस्त मरुभूमि गूंज रही थी। वह देवताओं और शूरवीरों की विरुदावली गा रही थी। छोटेछोटे हरे रंग के दैत्य उनके होंठ और